Tuesday, May 29, 2012

सनातन ज्ञान अजर अविनाशी मार्ग है इसकी व्याख्या अनन्त है इसको गीता में भगवान श्री कृष्ण ने थोड़े से शब्दों में स्पष्ट किया कि
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ।
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुमुखं कर्तुमव्ययम् ।।
अर्थात्
सनातन विज्ञानसहित ज्ञान है जो समस्त विद्याओं का राजा है जो समस्त गोपनीय ज्ञान का राजा है जो पवित्र अति उत्तम प्रत्यक्ष फल देने वाला धर्मयुक्त एवं स्वयं में साधने वाले हेतु अत्यंत सुगम व अविनाशी है
आज हमारे देश को हमारे समाज को हमारी नई पीढ़ी को इस ज्ञान की अत्यंत आवश्यकता है अतः हमें प्रयास करना चाहिये कि हमारे देश के विद्यालयों मेँ इसकी शिक्षा अनिवार्य कर दी जाये क्योंकि बिना श्रीगीता ज्ञान के नवयुवा पीढ़ी में तब्दीली लाना असम्भव है
।। जय जय श्री गोविन्दः ।।

Saturday, May 26, 2012

मनमोहन सिंह अमेरिकन एजेंट है



जिसने करुणानिधि और T.R.Balu के साथ मिलकर ये प्लान बनाया है

भगवान श्री राम की सबसे बड़ी निशानी श्री राम सेतु को तोड़ा जाए और कचरा अमेरिका को बेचा जाये ....

ये कचरा नही है भारतीय साइंटिस्ट का कहना है | की इस सेतु ( धनुस कोटि ) के टली मे 7 तरह के रेडियो एक्टिव एलीमेंट है | जो सिर्फ़ भारत में ही मिले है

जिससे निकाल कर 150 साल तक बिजली और परमाणु बम्ब बनाये जा सकते हैं । और ये बात भारत के सबसे बड़े वैज्ञानिक डॉ ऐ . पी . जे अबदुल कलाम जी ने कही थी ।

मित्रो अमेरिका की नजर इस रेडियो एक्टिव मैटिरियल पर लगी ।ये लोग इसे अमेरिका को बेचना चाहते हैं ,

ये इसे तोड़ने मे एक बार असफल हो चुके हैं ये दुबारा नया प्लान बना रहे है..उसे युनेस्को जैसी बाहरी संस्था के हवाले न किया जाए...



प्लीज़ भारत बचाने के लिए आगे आए...

आग की तरह video को हर ग्रुप और मित्रो की wall शेयर करे ।



जय जय श्री राम ।


जिन लोगो ऊपर लिखे पर विशवास न हो वो सिर्फ़ एक बार ये video देखें ।

विडियो लिंक :-http://www.youtube.com/watch?v=6vL2imvw4FA&sns=fb

Friday, May 25, 2012

पिछड़े मुस्लिमों की सहायता के उपाय

“दलित तो दलित होता है, चाहे वो हिन्दू हो या मुसलमान… सब दलितों को आरक्षण मिलना चाहिए… उनकी भलाई के बारे में हमने नहीं सोचा तो कल सड़कों पर खून बहेगा.” ऐसे कुछ विचार श्री रामदेव जी, जो कि भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के नेता हैं, ने अभी कुछ दिन पहले मुसलमानों के एक समूह में खड़े होकर व्यक्त किये हैं. श्री रामदेव जी ने इस समूह में यह मांग की कि ‘अल्पसंख्यक’ दलितों को भी अनुसूचित जाति और जनजाति में शामिल किया जाए.
हठयोग के धुरंधर प्रचारक ने प्रतिज्ञा कर ली है कि मुसलमानों के हक़ की आवाज को मौलानाओं से ज्यादा अब वो उठाएंगे. पर उनकी इस घोषणा ने उनके समर्थकों और विरोधियों दोनों को ही दोराहे पर ला खड़ा किया है. दलित मुसलमानों को न्याय न मिलने पर सड़कों पर खून खराबे की भविष्यवाणी ने जहां एक तरफ राष्ट्रवादी गुटों में हलचल मचा दी है वहीं दूसरी तरफ ‘अल्पसंख्यकों’ के अधिकारों के लिए दिन रात एक करने वाले दलों की भी नींद उड़ा दी है! क्योंकि ऐसी भविष्यवाणी तो अल्पसंख्यक प्रेम के लिए मशहूर कांग्रेस ने तब भी नहीं की थी जब उसने उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले मुसलमानों को ओबीसी कोटे में अलग से कोटा दिया था!
आज के दिन केवल हिन्दू, सिख, और बौद्ध ही संविधान के अनुच्छेद ३४१ के तहत अनुसूचित जाति और जनजाति के अंतर्गत आरक्षण पाते हैं. जो भी आदमी/संगठन (दलित) मुसलमानों की पीड़ा से दुखी है, हम उनका सम्मान करते हैं. पर साथ ही हम यह भी घोषणा करते हैं कि मुसलमान और ईसाई धर्मों को अनुसूचित जाति/जनजाति में शामिल करने की कोई भी मांग पूरी तरह देश, इस्लाम, ईसाई, और हिन्दू धर्मों के विरुद्ध है और इतना ख़तरा पैदा कर सकती है जितना आज़ादी से पहले हजार साल तक भारत पर हमला करने वाले विदेशी भी नहीं कर सके.
याद रहे कि भारत में लगभग ५०% मुसलमानों को ओबीसी कोटे के तहत पहले ही आरक्षण मिलता है. पर सच्चर कमेटी ने पाया कि इस आरक्षण के बावजूद भी ‘ओबीसी मुस्लिम’ अपने ‘ओबीसी गैर मुस्लिमों’ से प्रतियोगिता में पिछड़ जाते हैं. इसलिए मुसलमानों के लिए ओबीसी कोटे में भी अलग से ४.५% कोटा बना दिया गया है जिसे १५% तक बढाने की मांग चल रही है. यही नहीं, तमिलनाडु, आन्ध्र, कर्नाटक, और बिहार जैसे राज्यों में मुसलमान इससे भी ज्यादा आरक्षण लेते हैं. और यह आरक्षण उनको मिलने वाले ‘अल्पसंख्यक विशेष अधिकार’ से अलग हैं! भारत में रहने वाला ‘अल्पसंख्यक’ मुस्लिम समुदाय यहाँ इतने अधिकार पाता है कि जितने मुस्लिम देशों में रहने वाले बहुसंख्यक मुस्लिम भी नहीं पाते. 
खैर, जो भी (दलित) मुसलमानों के दुःख से वास्तव में दुखी हैं उनके लिए हम कुछ सुझाव देते हैं. हमने ये सुझाव बड़े सरल रखे हैं ताकि इन पर अमल करने में कोई देरी और मुश्किल न हो. इसके बाद हम वो कारण सामने रखेंगे जिनकी वजह से अनुच्छेद ३४१ में मुस्लिम और ईसाई मतों को शामिल करना देश के लिए घातक सिद्ध होता है.
श्री रामदेव जी को ५ सूत्रीय कार्यक्रम - मुसलमानों और ख़ास तौर पर ‘दलित’ मुसलमानों की सहायता के उपाय
न केवल श्री रामदेव जी, बल्कि हर एक वो नेता जिनके दिलों में अगड़े और पिछड़े मुसलमानों के लिए कुछ करने की तड़प है और जिनको लगता है कि ‘अल्पसंख्यक’, ‘ओबीसी’ आदि कोटों में शामिल करने के बावजूद भी मुसलमान भाई दबे कुचले हुए हैं, ऐसे सज्जनों के लिए यहाँ बड़े सरल सूत्र सुझाए जा रहे हैं. (यदि इन सुझावों को पहले ही अमल में लाया जा चुका है तो अग्निवीर इसका स्वागत करता है और साथ ही अनुरोध करता है कि इस विषय में विस्तार से औपचारिक घोषणा करें.) पर उससे पहले कुछ बातों का उल्लेख जरुरी है.
(दलित) मुस्लिम का पिछड़ापन केवल पैसों की तंगी के कारण नहीं है. बल्कि समाज के दूसरे तबकों से विश्वास, बराबरी, और सम्मान की कमी ज्यादा बड़े कारण हैं. इसलिए पिछड़े तबके के लिए काम करने वाले किसी भी संत महात्मा के लिए यह जरुरी है कि वो इन मामलों में खुद एक उदाहरण सामने रखे.
इसलिए देश के बड़े संगठन और महत्त्वपूर्ण लोगों जैसे भारत स्वाभिमान ट्रस्ट, पतंजलि योगपीठ, श्री रामदेव जी, श्री मुलायम सिंह यादव जी, श्री राहुल गांधी जी आदि का यह दायित्त्व बनता है कि पिछड़े मुसलमानों/अल्पसंख्यकों को बराबरी और विश्वास दिलाकर खुद एक मिसाल पेश करें ताकि बाकी लोग भी प्रेरणा ले सकें. अल्पसंख्यक/पिछड़ा अल्पसंख्यक प्रेम को सार्थक करने के लिए अग्निवीर इन महानुभावों को पांच सूत्रीय कार्यक्रम देता है और यह विश्वास दिलाता है कि वह खुद इस मसले में तन मन धन से सहयोग करेगा.
१. श्री रामदेव जी यह वचन दें कि उनकी कम्पनियों और ट्रस्टों के खर्च का ७५% केवल दलितों के विकास, शिक्षा, और रोजगार पर खर्च होगा, खासकर (दलित) मुस्लिमों के विकास पर.
२. श्री रामदेव जी की हर कंपनी, ट्रस्ट, और राजनैतिक या सामाजिक दलों की कमान (दलित) मुसलमानों के हाथ में होगी. इन दलों और कम्पनियों के प्रमुख, वक्ता, और योजनाकार दलित मुसलमान होंगे.
३. उनकी सब पत्रिकाओं और पुस्तकों का सम्पादन दलित मुस्लिम ही करें. जिससे दुनिया वाले यह देख सकें कि काबिलियत केवल अगड़े गैर मुसलमानों के हाथ की ही जागीर नहीं है.
४. उनकी सब कम्पनियों, ट्रस्टों, आश्रमों में खाना बनाने से लेकर रसोई का सारा काम दलित मुसलमान ही करें. इससे दुनिया में छूत अछूत की मूर्खता के खिलाफ कड़ा सन्देश जाएगा.
५. श्री रामदेव जी इस बात से आहत हैं कि अक्सर लोग कहते हैं कि सब आतंकवादी मुसलमान होते हैं. इस बात को वह पूरी तरह झूठ समझते हैं. अब इस बात को दुनिया में साबित करने के लिए उनको चाहिए कि अपनी सुरक्षा में लगे सब जवानों को ऐसे सुरक्षाकर्मियों से बदल दें जो पांच बार के नमाजी हों, जो चेहरे पर दाढ़ी रखें, और जिसके माथे पर नमाज का निशान हो. ऐसा करते ही इस्लाम के बारे में लोगों की गलत धारणा मिट जायेगी. केवल श्री रामदेव जी ही नहीं बल्कि वो सब नेता जिनका दिल ‘मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना’ के तराने गाता है, उन सबको यह करना चाहिए.
खासकर इन सब महानुभावों को चाहिए कि व्यक्तिगत सुरक्षा में लगे सब जवान वही लोग हों जो सामने आकर खुद को कट्टर मुसलमान कहते हों. जरा सोचिये, जब सब बड़े नेताओं की व्यक्तिगत जेड सुरक्षा कट्टर मुसलमानों के हाथ में होगी तो फिर कौन माई का लाल इस्लाम को आतंकवाद से जोड़ने की हिम्मत कर सकेगा?
(यहाँ तक कि सिखों को भी कुछ लोगों की कारस्तानी के कारण आतंकवाद से जोड़ा गया. पर क्योंकि सिख सेना, पुलिस, और हर सुरक्षा के विभाग में बड़ी संख्या में मिलते हैं, इस कारण कोई सिख मत को आतंकवाद से नहीं जोड़ सका और आज भी सिख जाति एक देशभक्त और वीर समूह के रूप में देश में जानी जाती है)
कितने दुःख की बात है कि पाकिस्तान जैसे कट्टरपंथी देश में भी वहां के नेता किसी कट्टर दाढ़ी रखे पांच बार के नमाजी मुसलमान को अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा के लिए नहीं रखते. पर भारत के नेताओं और खासकर श्री रामदेव जी के पास यह सिद्ध करने का सुनहरा मौक़ा है कि मुसलमानों का आतंक से कोई लेना देना नहीं है, बस इसके लिए अपनी सुरक्षा के लिए ऐसे मुसलमान भाइयों को चुन लें. बड़े दुर्भाग्य की बात है कि ‘मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना’ की दिन रात रट लगाने वाले नेता एक ख़ास मजहब के लोगों को अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा में कभी नहीं लगने देते. हमें आशा है कि श्री रामदेव जी मनसा वाचा कर्मणा एक होकर सच्चे ‘अल्पसंख्यक’ हितैषी सिद्ध होंगे.
यह कदम ‘दलित मुसलमानों’ के लिए न केवल बराबरी का पैगाम लाएगा बल्कि उनके लिए रोजगार भी पैदा करेगा जो कि हर ‘अल्पसंख्यक’ हितैषी का सपना है.
इन पांच बिन्दुओं पर अग्निवीर को श्री रामदेव जी और अन्य ‘दलित’ मुस्लिम हितैषी नेताओं की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा है. अग्निवीर तन मन धन से उन सब नेताओं का सहयोग करेगा जो इन पांच बातों को व्यवहार/अमल में उतारेंगे (यह कोई मायने नहीं रखता की अग्निवीर का इन मुद्दों पर निजी मत क्या है. किन्तु जो किसी भी मुद्दे का समर्थन करते हैं, उनकी इमानदारी तो केवल कर्मों से ही झलकती है, बातों से नहीं. अग्निवीर तो इस इमानदारी का कायल है, चाहे वैचारिक मतभेद क्यूँ न हों).

Wednesday, May 23, 2012

हिन्दू दृष्टि समतावादी एवं समन्वयवादी

हिन्दू विचारक कहता है ‘उदारचरितानाम् वसुधैव कुटुम्बकम्’ । श्रेष्ठता-मनोग्रन्थि या हीनता-मनोग्रन्थि निम्न स्तर के लोगों में पायी जाती है । हिन्दू विचारधारा का जो जितना ही अधिक ज्ञाता होगा, वह उतना ही अधिक उदार होगा और उसे यह सम्पूर्ण विश्व ही कुटुम्ब के समान दिखायी देगा । वर्ण व्यवस्था और अस्पृश्यता के प्रचार के लिए पाखण्डी और स्वार्थी तत्त्व उत्तरदायी हैं । अपनी अज्ञानता और कुकृत्य को छिपाने के लिए जन्म के आधार पर ऊँच-नीच का भेद फैलाया गया है । वर्ण-व्यवस्था झूठ पर आधारित व्यवस्था है जो पाखण्डियों द्वारा निर्मित, पाखण्डियों द्वारा पोषित और पाखण्ड के विस्तार के लिए है । हिन्दू धर्म अपने चरम पर प्रत्येक व्यक्ति में परमात्मा को ही देखता है । धर्म की दृष्टि में न तो कोई अगड़ा है, न पिछड़ा, न दलित । धर्म न्याय का साथ देता है जिसमें सामाजिक न्याय शामिल है; निर्बल और असहाय को सहारा देने की बात करता है; दीन-दु:खी के आँसू पोछने की बात करता है; श्रमिक को उसका पूर्ण पारिश्रमिक देने की बात करता है; उत्पीड़न और अत्याचार का विरोध करने की प्रेरणा देता है ।
हिन्दुत्व हिन्दुओं को किसी एक प्रकार के रीति-रिवाज से नहीं बाँधता । किसी एक दर्शन को मानने के लिए बाध्य नहीं करता, किसी एक मत को अंगीकार करने के लिए विवश नहीं करता । यह ईश्वर में आस्था रखने या न रखने की छूट देता है । यह ऐसा उद्यान है जहाँ अधिक फल-फूल प्राप्त करने के लिए पेड़-पौधों की कटाई-छँटाई की जा सकती है । नये पेड़-पौधे लगाये जा सकते हैं । यह समन्वयकारी व्यवस्था है जो सबको अपने विचार प्रकट करने की स्वतन्त्रता देती है फिर भी आत्मानुशासन के बल पर पल्लवित और प्रस्फुटित हो रही है । यदि किसी को इस व्यवस्था में जड़त्व दिखता है तो सकारात्मक सुझाव देना चाहिए । लोगों को शराब, जुआ आदि से दूर रहने तथा सदाचरण के लिए प्रेरित करना चाहिए । ढोंगी साधुओं और पाखण्डी धर्म-गुरुओं से हिन्दू धर्म का उत्थान नहीं हो सकता ।

पर्यावरण की रक्षा को उच्च प्राथमिकता

हिन्दू धर्म में नीम, बेल, तुलसी, बरगद, पीपल, आंवला, आम आदि वृक्षों एवं पौधों को पूजा-अर्चना के साथ जोड़ा गया है । ये वृक्ष औषधियों के निर्माण एवं पर्यावरण की रक्षा करने में अत्यधिक महत्त्व रखते हैं । वस्तुत: हिन्दुत्व में प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित करने की चेष्टा की गयी है । सम्पूर्ण प्रकृति ही ईश्वर का शरीर है । इस प्रकार सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, नदी आदि को देवत्व प्रदान कर उनकी पूजा की जाती हैं

Monday, May 21, 2012

हिन्दुत्व का वास हिन्दू के मन, संस्कार और परम्पराओं में

हिन्दू विचारों को प्रवाहित करने वाले वेद हैं, उपनिषद् हैं, स्मृतियां हैं, षड्-दर्शन हैं, गीता, रामायण और महाभारत हैं, कल्पित नीति कथाओं और कहानियों पर आधारित पुराण हैं । ये सभी ग्रन्थ हिन्दुत्व के उद्विकास एवं उसके विभिन्न पहलुओं के दर्शन कराते हैं । इनकी तुलना विभिन्न स्थलों से निकलकर सद्ज्ञान के महासागर की ओर जाने वाली नदियों से की जा सकती है । किन्तु ये नदियाँ प्रदूषित भी हैं । उदाहरण के लिए झूठ पर आधारित वर्ण व्यवस्था को सही ठहराने और प्राचीन स्वरूप देने के लिए ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में कुछ अंश जोड़ा गया । ऊँच-नीच की भावना पैदा करने के लिए अनेक श्लोक गढ़कर मनुस्मृति के मूल स्वरूप को नष्ट कर दिया गया । पुराणों में इतनी अधिक काल्पनिक कथाएँ जोड़ी गयीं कि वे पाखण्ड एवं अंधविश्वास के आपूर्तिकर्ता बन गये । आलोचनाओं में न उलझकर किसी भी ग्रन्थ के अप्रासंगिक अंश को अलग करने पर ही हिन्दुत्व का मूल तत्त्व प्रकट होता है ।
वस्तुत: सामान्य हिन्दू का मन किसी एक ग्रन्थ से बँधा हुआ नहीं है । जैसे ब्रिटेन का संविधान लिखित नहीं है किन्तु वहां जीवन्त संसदीय लोकतन्त्र है और अधिकांश लोकतान्त्रिक प्रक्रिया परम्पराओं पर आधारित है; उसी प्रकार सच्चे हिन्दुत्व का वास हिन्दुओं के मन, उनके संस्कार और उनकी महान् परम्पराओं में है ।

ब्रह्म या परम तत्त्व सर्वव्यापी है

ब्रह्माण्ड का जो भी स्वरूप है वही ब्रह्म का रूप या शरीर है । वह अनादि है, अनन्त है । जैसे प्राण का शरीर में निवास है वैसे ही ब्रह्म का अपने शरीर या ब्रह्माण्ड में निवास है । वह कण-कण में व्याप्त है, अक्षर है, अविनाशी है, अगम है, अगोचर है, शाश्वत है । ब्रह्म के प्रकट होने के चार स्तर हैं - ब्रह्म, ईश्वर, हिरण्यगर्भ एवं विराट (विराज) । भौतिक संसार विराट है, बुद्धि का संसार हिरण्यगर्भ है, मन का संसार ईश्वर है तथा सर्वव्यापी चेतना का संसार ब्रह्म है ।
 सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ अर्थात् ब्रह्म सत्य और अनन्त ज्ञान-स्वरूप है । इस विश्वातीत रूप में वह उपाधियों से रहित होकर निर्गुण ब्रह्म या परब्रह्म कहलाता है । जब हम जगत् को सत्य मानकर ब्रह्म को सृष्टिकर्ता, पालक, संहारक, सर्वज्ञ आदि औपाधिक गुणों से संबोधित करते हैं तो वह सगुण ब्रह्म या ईश्वर कहलाता है । इसी विश्वगत रूप में वह उपास्य है । ब्रह्म के व्यक्त स्वरूप (माया या सृष्टि) में बीजावस्था को हिरण्यगर्भ (सूत्रात्मा) कहते हैं । आधार ब्रह्म के इस रूप का अर्थ है सकल सूक्ष्म विषयों की समष्टि । जब माया स्थूल रूप में अर्थात् दृश्यमान विषयों में अभिव्यक्त होती है तब आधार ब्रह्म वैश्वानर या विराट कहलाता है ।

Sunday, May 20, 2012

गोष्ट थोड़ी मोठी आहे पण छान आहे... नक्की वाचा....

एक माणूस एकदा एका अरण्यात फिरता फिरता वाट चुकला. भटकत भटकत तो अरण्याच्या खूप आत पोहचला. अरण्याचा हा भाग एकदम निर्जन होता. तिथे एका परी अन एका भूताचे राज्य होते. दोघेही आपापल्या राज्याच्या वेशीवर बसून शिळोप्याच्या गप्पा करीत होते.

वाट चुकलेल्या माणसाला बघून परी म्हणाली अरे मी ओळखते ह्याला! लहान पणी मी ह्याच्या स्वप्नात जायचे, हा खूप खूप आनंदून जायचा मला बघून! मग आम्ही खूप खूप खेळायचो, नाचायचो खूप खूप भटकायचो. हा तर अगदी हट्टच करायचा तू जाउ नकोस म्हणून. मला आठवतंय सगळं त्यालाही आठवेल!

तो ओळखेल मला नक्कीच! मला वाटतं माझ्याच शोधात आलाय तो इथे. मी त्याचं अगदी जोरदार स्वागत करील. त्याला माझ्या राज्यात नेईल, त्याला छान सगळीकडे फिरवील. मी त्याच्या सगळ्या इच्छा पूर्ण करील. आम्ही खूप खूप मज्जा करू.

भूत म्हणले, मी ही ओळखतो ह्याला. मी ही जायचो ह्याच्या लहानपणी ह्याच्या स्वप्नात. तेव्हा हा खूप घाबरायचा मला, अगदी थरथर कापायचा, मला बघून ह्याला भर थंडीतही दरदरून घाम फुटायचा ह्याला कधी कधी तर दचकून झोपेतून उठायचा, मग पांघरुण ओढून गुडुप झोपायचा प्रयत्न करायचा.

परी म्हणाली, तुझं असंच रे तूला सगळेच घाबरतात, तो काही केल्या तुझ्या जवळ यायचा नाही.

भूत म्हणाले, नाही! तसं होणारच नाही. तो माझ्या राज्यातून पुढे जाऊच शकणार नाही .

परी म्हणाली, नाही! नाही तो नक्कीच येईल तू बघच. त्याला खूप खूप आवडायची रे मी!

भूत म्हणाले, ती फार जुनी गोष्टं तेव्हा तो फार लहान होता. आता तर त्याला तू आठवणार ही नाहीस.

परी म्हणाली, आठवेल आठवेल त्याला सगळं! किती किती गोड होतं ते सगळं! ते रम्य बालपण! त्या गोष्टी विसरतो काय कुणी?

भूत म्हणाले, तुला वाईट वाटेल पण तो तुला विसरलाय हे नक्की. आता तर तो तुझ्यावर विश्वास सुद्धा ठेवणार नाही.

परी म्हणाली, मग तो तुझ्या राज्यात काय म्हणून येईल तो तुलाही विसरला असणार ना? तो काय म्हणून तुझ्यावर विश्वास ठेवील?

भूत म्हणले, तसं होत नाही कधीच तो मला नक्कीच ओळखेल तो मला विसरणार नाही कधीच.

परी म्हणाली, तो मला ही विसरणार नाही, बघ तू आता कशी आठवण करून देते त्याला तू बघच. माझा निर्माता आहे विश्वास. विश्वास कधीच खोटा ठरायचा नाही! तू बघच तो मला नक्कीच ओळखेल, लावतोस पैज!

भूत म्हणाले, पैज नको लाउस कारण मला चांगला अनुभव आहे तू नक्कीच हारशील.

परी म्हणाली, नाही माझा विश्वास कधीच खोटा ठरणार नाही, तूच घाबरतो आहेस पराभवाला! म्हणून टाळतो आहेस ना?

भूत म्हणाले, ठीक आहे बघ प्रयत्न करून.

परी म्हणाली, सांग मी जिंकली तर काय देशील?

भूत हसले आणि म्हणले, जर तू जिंकलीस तर मी तुला माझे पूर्ण राज्य देऊन टाकील, अन मी कायमचा ह्या जगातून निघुन जाईल.

बघ हं! परी म्हणाली, वेळेवर शब्द फिरवायचा नाही.

नाही फिरवणार! भूत म्हणाले.

मग परी ने विश्वासाची आराधना केली, अन तिने गोड आवाजात गाणे म्हणणे सुरु केले, पक्षी ही आपल्या गोड गळ्याने तिला सुरात साथ देऊ लागले. परी ने मग हळू हळू नाचायला सुरवात केली. वारा मंद मंद शीळ वाजवून तिला साथ देऊ लागला, पानांची सळसळ सुरु झाली. आनंदानी झाडे अन वेली ही डोलू लागली. फुलांनी आपल्या पाकळ्या पसरायला सुरवात केली.वातातावरण प्रसन्न होऊ लागले माणूस ही आनंदी होऊ लागला. परी ने मग मनातल्या मनात दुप्पट जोमानी विश्वासाची आळवणी केली, आता सूर्याने वनावर आपली किरणे फेकली त्या किरणात माणसाला परी चे सोनेरी केस तिचे सुंदर डोळे दिसू लागले, हळूहळू त्याला तीची पूर्ण आकृती दिसू लागली. परी आनंदून गेली तिने त्याच्या स्वागता साठी हात पसरले.

माणसाला स्वता:च्या डोळ्या वर विश्वासच बसेना. भ! भ! भूत!! त्याच्या तोंडातून कसेबसे शब्द बाहेर पडले.

अचानक आकाशात ढग भरून येऊ लागले, विजांचा कडकडाट सुरु झाला, सूर्य ढगांच्या आड लपून गेला, अंधारून येऊ लागले, सोसाट्याचा वारा सुरु झाला, झाडे कडाकडा मोडून पडू लागली, माणूस भयानी घामाघूम झाला, त्याची दातखीळ बसली अन तो कोसळून गतप्राण झाला.
सर्व काही शांत झाले. परी धावतच माणसा जवळ गेली अन रडू लागली. ती भूताला म्हणाली, तूच जिंकलास. नेहमी तूच का रे जिंकतोस. मला सगळे का विसरून जातात?
भूत ही खिन्न झाले, त्यानी परीच्या खांद्या वर थोपटले. ते म्हणाले हे असंच होतं.नेहमीच! तुझा निर्माता आहे विश्वास, माझा निर्माता आहे भय. विश्वास काय अन भय काय हे ह्याच्याच डोक्यातून जन्म घेतात. हाच आपला मुळ निर्माता आहे, आपले वेगळे अस्तित्व नाही. पण!
पण! पण काय? परी म्हणाली.
हा मोठा झाला होता. अन जसा जसा माणूस मोठा होत जातो ना तसा तसा त्याचा विश्वास कमी होत जातो, पण! पण भय मात्र वाढत जातं. म्हणूनच मी जिंकतो. पण तू उदास नको होऊस,
माझा शब्द अजून कायम आहे जेव्हा ही विश्वासाचा विजय होईल ना त्या दिवशी मी खरंच हे जग नेहमी साठी सोडून जाईल. भूत म्हणले.आहे जेव्हा ही विश्वासाचा विजय होईल ना त्या दिवशी मी खरंच हे जग नेहमी साठी सोडून जाईल. भूत म्हणले.

Tuesday, May 15, 2012

culture,religion are support live in life.

जीवन यह मानव के लिए विधाता की अनमोल देण है.
इसे हर इन्सान अपने अपने तरीके से जीना चाहता है
इस के आधार से मनुष्य  ज्ञानप्राप्ति , भगवन और
स्वर्गसुख की प्राप्ति जेसे नामुकिन कार्यो पर विजय हासिल
 कर सकता है.
जिंदगी के दो प्रमुख स्त्रोत है १)जिन्दगी जीना २) मनचाहे तरीकेसे जिन्दगी जीना
 परमार्थ से भगवन प्राप्ति होती है मन चाहा जीवन जी सकते हो
परमार्थ का पहला पद्य : यह जीवन भगवन की देण है उसे कभी मत भूलो
स्व + आत्मा+ अभिमुखता =स्वात्मभिमुखता यही परमार्थ की पहली शिडी है
और भगवन प्राप्ति अंतिम  सीडी


जिंदगी  उस  कतार  की  तरह  है  जहा  से हम  इसमें  जुड़ते  है
 तो खुद  को  सब  के  पीछे  पाकर  यह  सोचते  है  हम 
सब  के  पीछे  है  पर  कोई  हमे  नही  देख  रहा 
परन्तु  जब  हम  मध्य  में  आते  है  तो  पता  चलता  है  के 
बहोत  लोग  हमारे  आगे  और  बहोतसे   पीछे  है 
पर  जब  हम   इसे  पार  कर  जाते   है  तब  पता  चलता  है 
के  हमने  जहा  से  सुरुवात  की  थी  अभी  वहा 
कोई  पहला  है  बस  हमने  अपना  सफर  खत्म  किया  
पर  जिंदगी  जहा  क  तहा  है .....................